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काकडकोपर में ‘समर्पण दीप आध्यात्म महोत्सव’ का भव्य आयोजन विहंगम योग संत समाज के 103वें वार्षिकोत्सव के उपलक्ष्य में संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज का प्रेरणादायी संदेश

✍️ सतिष पटेल विहंगम योग संत समाज के 103वें वार्षिकोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित ‘समर्पण दीप आध्यात्म महोत्सव’ के अंतर्गत संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज के मार्गदर्शन में संचालित ‘कन्याकुमारी से कश्मीर स्वर्वेद संदेश यात्रा’ काकडकोपर की पवित्र भूमि पर पहुंची। नानापोंढा के समीप आयोजित इस आध्यात्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संत, साधक, श्रद्धालु, […]

  • ‘कन्याकुमारी से कश्मीर स्वर्वेद संदेश यात्रा’ के तहत काकड़कोपर में भव्य आध्यात्मिक आयोजन हुआ।
  • संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज ने सेवा, सत्संग, साधना और आत्मजागरण का संदेश दिया।
  • पूर्व मंत्री एवं कपराडा विधायक जीतुभाई चौधरी की उपस्थिति में आदिवासी समाज की परंपरा और आध्यात्मिक चेतना का संगम देखने को मिला

✍️ सतिष पटेल :

विहंगम योग संत समाज के 103वें वार्षिकोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित ‘समर्पण दीप आध्यात्म महोत्सव’ के अंतर्गत संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज के मार्गदर्शन में संचालित ‘कन्याकुमारी से कश्मीर स्वर्वेद संदेश यात्रा’ काकडकोपर की पवित्र भूमि पर पहुंची। नानापोंढा के समीप आयोजित इस आध्यात्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संत, साधक, श्रद्धालु, सामाजिक कार्यकर्ता तथा भक्तगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम में भक्ति, साधना, सत्संग, सेवा और राष्ट्रभावना का अद्भुत संगम देखने को मिला।

(पूर्व मंत्री एवं कपराडा विधायक जीतुभाई चौधरी की गरिमामयी उपस्थिति में दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। )

कार्यक्रम का वातावरण प्रारंभ से ही आध्यात्मिक और भक्तिमय रहा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से ‘हम सबका संकल्प महान, विहंगम योगी करे पुकार’ जैसे जयघोषों के साथ आध्यात्मिक संकल्प को मजबूत किया। इसके साथ ही ‘स्वर्वेद महामंदिर धाम की जय’, ‘गुरुदेव की जय’, ‘सत्य सनातन धर्म की जय’, ‘दंडकवन आश्रम की जय’, ‘गौ माता की जय’ और ‘भारत माता की वंदे’ जैसे जयघोषों से पूरा परिसर गूंज उठा।

संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि आज की संध्या अत्यंत आध्यात्मिक और महत्वपूर्ण है। दक्षिण गुजरात की इस पवित्र भूमि पर वलसाड जिले के संत समाज और श्रद्धालुओं की उपस्थिति में राष्ट्रव्यापी स्वर्वेद संदेश यात्रा को आगे बढ़ाने का अवसर मिला है। उन्होंने दक्षिण गुजरात के लोगों की सहजता, सरलता, सौम्यता, श्रद्धा और प्रेम की विशेष सराहना करते हुए कहा कि यही सरल और शुद्ध भाव मनुष्य के कल्याण का साधन बनता है।

(इस अवसर पर आदिवासी समाज के पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज का भव्य एवं आत्मीय सम्मान किया गया।)

कन्याकुमारी से शुरू हुई आध्यात्मिक यात्रा

संतप्रवर ने बताया कि इस वर्ष स्वर्वेद संदेश यात्रा का शुभारंभ देश के दक्षिणतम छोर कन्याकुमारी की पवित्र भूमि से हुआ। कन्याकुमारी वह स्थान है जहां अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी का संगम होता है। उन्होंने इस संगम को आध्यात्मिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि जिस प्रकार तीन सागरों का संगम एक महान प्रतीक है, उसी प्रकार मानव जीवन में सेवा, सत्संग और साधना का संगम होना चाहिए।

उन्होंने मनुष्य के जीवन में मन, वचन और कर्म की एकता को भी आवश्यक बताया। आध्यात्मिक दृष्टि से इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के संतुलन तथा गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा हमेशा से जीवन के बाहरी और आंतरिक दोनों पक्षों के संतुलन का संदेश देती रही है।

कन्याकुमारी से यात्रा प्रारंभ होने से पहले 51 कुंडीय विश्व शांति वैदिक महायज्ञ में यज्ञ भगवान को आहुतियां समर्पित की गईं। इसके बाद यह राष्ट्रव्यापी यात्रा विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से होकर आगे बढ़ी। संतप्रवर ने बताया कि श्रद्धालुओं की श्रद्धा, भक्ति, समयदान, पुरुषार्थ और उत्साह के कारण यह यात्रा निरंतर गतिमान हो रही है।

गुजरात में प्रवेश के बाद यात्रा ने सौराष्ट्र और काठियावाड़ क्षेत्र में आध्यात्मिक संदेश पहुंचाया और इसके बाद दक्षिण गुजरात की ओर आगे बढ़ी। सूरत, तापी और नवसारी के बाद वलसाड जिले में दंडकवन आश्रम के निकट पहुंचने पर श्रद्धालुओं की भक्ति देखकर संतप्रवर ने प्रसन्नता व्यक्त की।

(फर्न हिल स्ट्रीट, काकड़कोपर (सिल्वर लिफ्ट होटल) में संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज ने किया ध्वजारोहण )

दंडकवन आश्रम का आध्यात्मिक महत्व

संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज ने दंडकवन आश्रम को दक्षिण गुजरात की महत्वपूर्ण आध्यात्मिक धरोहर बताते हुए कहा कि इसकी आध्यात्मिक सुगंध केवल दक्षिण गुजरात तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे विश्व में फैल रही है। सद्गुरु के पावन चरणों से पवित्र यह भूमि साधना, सेवा और सत्संग का केंद्र है।

उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहजता, सरलता और सौम्यता है। दक्षिण गुजरात के लोगों में यह गुण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। श्रद्धा के साथ जब सेवा जुड़ती है और सेवा के साथ साधना जुड़ती है, तब आध्यात्मिक जीवन सार्थक बनता है।

संतप्रवर ने उपस्थित श्रद्धालुओं से कामना की कि उनके भीतर का भक्ति भाव, श्रद्धा, सत्य विश्वास और प्रेम निरंतर बढ़ता रहे। उन्होंने कहा कि अंतरात्मा में बहने वाली प्रेम की धारा को ही मनुष्य ने भक्ति कहा है। भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरों के प्रति प्रेम, सेवा और कल्याण की भावना भी भक्ति का ही स्वरूप है।

(नानापोढ़ा बिरसा मुंडा सर्कल पर संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज का भव्य सम्मान
नानापोढ़ा स्थित बिरसा मुंडा सर्कल पर संतप्रवर श्री विज्ञान देवजी महाराज का भव्य एवं आत्मीय सम्मान किया गया। इस अवसर पर भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर पूजा-अर्चना एवं पुष्पांजलि अर्पित कर आदिवासी समाज की गौरवशाली परंपरा और संस्कृति को नमन किया गया।)

सेवा ही आध्यात्मिक जीवन का आधार

संतप्रवर ने कहा कि संपूर्ण सृष्टि निरंतर मानव की सेवा कर रही है। बादल वर्षा करते हैं, पेड़-पौधे फल और प्राणवायु देते हैं, नदियां जल प्रदान करती हैं, धरती हमें जीवन देती है और सूर्य-चंद्रमा अपनी नियमित गति से संसार को ऊर्जा प्रदान करते हैं। प्रकृति की प्रत्येक शक्ति अपने नियम के अनुसार मानव जीवन और समस्त जीव-जगत के लिए कार्य कर रही है।

जब प्रकृति निरंतर सेवा में लगी है, तब मनुष्य के जीवन का उद्देश्य भी केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जीवन को सेवा, सत्संग और साधना से जोड़ना ही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की विशेषता है।

उन्होंने कहा कि सच्ची सेवा वही है जिसके कारण किसी व्यक्ति को अनावश्यक कष्ट न पहुंचे। हमारे मन, वचन और कर्म से किसी को दुख न मिले तथा हमारे कारण समाज में सुख, शांति और कल्याण बढ़े। सेवा मनुष्य को अपने कर्तव्य और दायित्व के प्रति जागरूक बनाती है। सेवा समाज को जोड़ती है, अहंकार को कम करती है और व्यक्ति के जीवन का विकास करती है।

स्वर्वेद महामंदिर धाम आध्यात्मिक चेतना का केंद्र

अपने संबोधन में संतप्रवर ने काशी की पवित्र भूमि पर निर्माणाधीन स्वर्वेद महामंदिर धाम का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक भव्य मंदिर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान, सेवा और साधना का केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

गुलाबी और लाल पत्थरों से निर्मित इस भव्य धाम में भारतीय संस्कृति की सुंदर झलक दिखाई देती है। मंदिर के निर्माण में उपयोग किए जा रहे पत्थरों और वास्तुशिल्प की विशेषता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह धाम आने वाली पीढ़ियों के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का केंद्र बनेगा।

संतप्रवर के अनुसार, स्वर्वेद महामंदिर धाम के सात स्तरों की परिकल्पना की गई है। वर्तमान में प्रथम तल श्रद्धालुओं, जिज्ञासुओं और पर्यटकों के दर्शन के लिए उपलब्ध है। देश के विभिन्न हिस्सों तथा विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग इस आध्यात्मिक धाम का दर्शन करने पहुंच रहे हैं।

उन्होंने कहा कि स्वर्वेद महामंदिर धाम का उद्देश्य केवल भव्य निर्माण नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाना है। यदि ज्ञान के माध्यम से किसी व्यक्ति के जीवन में शांति आती है, यदि किसी दुखी व्यक्ति का दुख कम होता है और यदि समाज में सकारात्मक चेतना का विकास होता है, तो वही वास्तविक सेवा है।

मन, बुद्धि और इंद्रियों पर संयम जरूरी

संतप्रवर ने अपने प्रवचन में मानव मन की शक्ति पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य के भीतर अपार ऊर्जा और शक्ति विद्यमान है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही धीरे-धीरे बनता जाता है। इसलिए विचारों की शुद्धता अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त को मानव के आंतरिक साधनों के रूप में समझाया। पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां बाहरी संसार से मनुष्य को जोड़ती हैं। आंखों से दृश्य, कानों से शब्द, नाक से गंध, जिह्वा से स्वाद और त्वचा से स्पर्श का अनुभव होता है। इन सभी अनुभवों को मन ग्रहण करता है और बुद्धि उनका विवेचन करती है।

उन्होंने मानव शरीर की तुलना रथ से करते हुए कहा कि शरीर रथ है, इंद्रियां घोड़ों के समान हैं, मन लगाम है और बुद्धि सारथी की भूमिका निभाती है। यदि मन और बुद्धि पर संयम हो तो जीवन सही दिशा में आगे बढ़ता है। यदि मन अनियंत्रित हो जाए तो इंद्रियां मनुष्य को विभिन्न दिशाओं में खींच सकती हैं।

इसलिए आध्यात्मिक साधना का एक प्रमुख उद्देश्य मन को संयमित करना है। मन जितना शांत और नियंत्रित होगा, व्यक्ति उतना ही सही निर्णय ले सकेगा और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना अधिक धैर्य से कर सकेगा।

प्रत्येक व्यक्ति में दिव्य शक्ति

संतप्रवर ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार हरे मेहंदी के पत्तों में लाल रंग छिपा होता है, दूध के कण-कण में मक्खन विद्यमान रहता है और चकमक पत्थर में अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य के भीतर दिव्य शक्ति विद्यमान है।

यह शक्ति बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि साधना और आत्मचिंतन से जागृत होती है। मनुष्य अपने भीतर झांकता है, अपने विचारों को शुद्ध करता है और सेवा-सत्संग-साधना से जुड़ता है तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है।

उन्होंने कहा कि परमात्मा केवल किसी बाहरी स्थान पर सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक जीव के भीतर चेतना के रूप में विद्यमान हैं। इस सत्य को समझने के बाद मनुष्य के व्यवहार में भी परिवर्तन आना चाहिए। जब हर व्यक्ति में परमात्मा का अंश देखने की भावना विकसित होती है, तब द्वेष, अहंकार और भेदभाव कम होने लगते हैं।

जीवन का अंतिम उद्देश्य आत्मज्ञान

संतप्रवर ने मानव जीवन की नश्वरता की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में अनेक वस्तुओं को अपना समझता है, लेकिन मृत्यु के समय इनमें से कोई भी वस्तु साथ नहीं जाती। शरीर भी हमें मिला है, लेकिन स्थायी रूप से हमारा नहीं है।

इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल धन, संपत्ति और भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। अपने कर्तव्यों का उचित पालन करते हुए धर्मपूर्वक अर्थ की प्राप्ति और जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति जरूरी है, लेकिन भारतीय दर्शन जीवन के अंतिम पुरुषार्थ के रूप में मोक्ष, परम ज्ञान और परम आनंद की ओर बढ़ने का संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि जीवन बहुत तेजी से बीत रहा है। मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि कहीं जीवन को जीने की दौड़ में जीवन का वास्तविक उद्देश्य ही पीछे न छूट जाए। ब्रह्मविद्या और आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की दिशा प्रदान करता है।

गीता का संदेश और मन की शांति

संतप्रवर ने भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन के संघर्ष में मनुष्य कई बार अर्जुन की तरह हताश और निराश हो जाता है। कठिन परिस्थितियां, पारिवारिक समस्याएं, सामाजिक चुनौतियां और भविष्य की चिंता मनुष्य को भीतर से कमजोर कर सकती हैं।

युद्धभूमि में अर्जुन की मानसिक स्थिति को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे आत्मज्ञान और कर्मयोग का संदेश दिया। भगवद्गीता का यह संदेश आज भी मानव जीवन के लिए उतना ही प्रासंगिक है। मन जितना शांत होगा, जीवन के निर्णय उतने ही विवेकपूर्ण होंगे।

उन्होंने कहा कि बाहर की परिस्थितियों को हमेशा मनुष्य अपने अनुसार नहीं बदल सकता, लेकिन वह अपनी आंतरिक स्थिति को अवश्य मजबूत बना सकता है। साधना, सत्संग और सेवा के माध्यम से व्यक्ति अपने मन को स्थिर बना सकता है। जब मन संयमित होता है, तब कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन की सहजता, सरलता और स्वाभाविकता बनी रहती है।

‘आत्म जागरण से राष्ट्र जागरण’ का संदेश

‘कन्याकुमारी से कश्मीर स्वर्वेद संदेश यात्रा’ का मूल उद्देश्य केवल आध्यात्मिक यात्रा करना नहीं, बल्कि समाज में आत्म जागरण से राष्ट्र जागरण की चेतना पैदा करना है। संतप्रवर ने कहा कि राष्ट्र का निर्माण केवल भौतिक विकास से नहीं होता। जब नागरिकों के भीतर चरित्र, अनुशासन, सेवा, सद्भावना और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना जागती है, तभी राष्ट्र वास्तव में मजबूत बनता है।

एक जागृत व्यक्ति अपने परिवार को जागृत करता है, जागृत परिवार समाज में सकारात्मक वातावरण बनाता है और जागृत समाज राष्ट्र की शक्ति बनता है। इसलिए आत्मजागरण को राष्ट्रजागरण की पहली सीढ़ी माना गया है।

25 हजार कुंडीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ का आह्वान

इस अवसर पर आगामी 14-15 दिसंबर 2026 को स्वर्वेद महामंदिर धाम, उमरहां, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में आयोजित होने वाले 25,000 कुंडीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ और विहंगम योग संत समाज के 103वें वार्षिकोत्सव की जानकारी भी दी गई।

‘समर्पण दीप आध्यात्म महोत्सव’ के माध्यम से देशभर में आध्यात्मिक चेतना को मजबूत करने का संकल्प लिया जा रहा है। इस महायज्ञ को ज्ञान, साधना, सेवा, संस्कार और विश्व शांति की भावना से जोड़कर देखा जा रहा है।

काकडकोपर में आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे आध्यात्मिक ज्ञान को अपने जीवन में उतारेंगे तथा समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए सेवा भावना से कार्य करेंगे।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर एक बार फिर ‘हम सबका संकल्प महान’ के जयघोष से वातावरण गूंज उठा। स्वर्वेद महामंदिर धाम, दंडकवन आश्रम, सद्गुरुदेव, यज्ञ भगवान, सत्य सनातन धर्म, गौ माता और भारत माता के जयघोष के साथ श्रद्धालुओं ने अपनी आस्था और संकल्प को व्यक्त किया।

काकडकोपर की पवित्र भूमि पर आयोजित यह ‘समर्पण दीप आध्यात्म महोत्सव’ भक्ति और साधना का कार्यक्रम होने के साथ-साथ मानव जीवन को सेवा, संयम, आत्मज्ञान और राष्ट्रभावना से जोड़ने वाला प्रेरणादायी अवसर बना। कन्याकुमारी से कश्मीर तक चल रही स्वर्वेद संदेश यात्रा का मूल संदेश—‘आत्म जागरण से राष्ट्र जागरण’—आज के समय में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के समग्र विकास के लिए एक प्रेरक विचार के रूप में सामने आया।

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